दरबार ए बहादुरशाह जफ्फर

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(यह एक मुंह देखने वाला दर्पण है , और इस पर की गई कला को नक्काशी कहते है )

इस पेंटिंग में कलाकार ने यह दिखाने का प्रयास किया है की बहादुर शाह जफर जो की हिन्दुस्थान के आखिरी मुग़ल शासक थे उनका हिन्दू मुस्लिम एकता लाने में बहुत बड़ा योगदान था और उनके दरबार में शानोशोकत के सारे इंतजाम थे और उनका सिंहासन था वो भी एंटिक था और बहुत ही भव्य था और उनके दाई तरफ उनके बड़े पुत्र मिर्जा रंक है और बाई तरफ उनके छोटे पुत्र कोयास है उनके पुत्रो को अपने पिता के दरबार में दिखाया गया है और बाई और ही एक सेवक चंवर से हवा देते हुए दिखाया है , इस दरबार में बहादुर शाह को हुक्के का सेवन करते दिखाया है , और ये पूरा दरबार जाफ़र के शानोशोकत को दर्शाता है| बहादुर शाह जफ़र का जन्म 24 अक्टूबर 1775 को दिल्ली में हुआ था | इनकी माता का नाम लाल बाई व पिता का नाम अकबर शाह ½ द्रितीय था | 1837 से 1857 तक ये सिंहासन पर बैठे | ये मुगलों के अंतिम सम्राट थे | जब ये गद्दी पर बैठे उस समय भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का राज था | इनको शायरी बहुत पसन्द थी | यह उर्दू के जाने माने शायर थे व इनके दरबार में भी कई बड़े शायरों को आश्रय दिया जाता था | बहादुर शाह के समय भारत पर ईस्ट इंडिया कंपनी अपने निजी हितो को ध्यान में रखकर नये-नये कानून बनाती थी | जब इस कंपनी ने मुगल सम्राट की उपाधि को खत्म करने का निश्चय किया तो सबमे असंतोष की लहर दोड़ गई | सरकार ने बहादुर शाह के बड़े पुत्र मिर्जा खां बख्त को युवराज बनाने से इंकार कर दिया , जिससे वह इस सरकार के विरुद्ध हो गये | वही दूसरी और उन्होंने उसके छोटे पुत्र कोयास को युवराज बना दिया | कोयास ने उनकी अपमान जनक शर्ते स्वीकार कर ली | ये शर्ते निम्न प्रकार थी – 1) आपको बादशाह की बजाय राजकुमार कहा जायेगा | 2) आपको दिल्ली का लाल किला खाली करना होगा | 3) आपको मासिक खर्च 1 लाख की बजाय 15 हजार मिलेगे | बहादुर शाह को भी लाल किला खाली करने का आदेश दिया गया | इस बात से बहादुर शाह नाराज हो गये और उन्होंने क्रांति में हिस्सा लिया |उन्होंने एक सेना संगठित की व इस सेना का खुद ने नेतृत्त्व किया | बहादुर शास ने आदेश दिया की हिन्दुस्थान के हिन्दुओ व मुसलमानों उठो खुदा ने जितनी बरकते इन्सान को दी है उनमे सबसे कीमती बरकत व वरदान आजादी है | हम दुश्मन का नाश कर डालेंगे और अपने धर्म तथा देश को खतरे से बचा लेंगे | बहादुर शाह की घोषणा से स्पष्ट होता है की यह क्रांति हिन्दू और मुसलमानों में एकता के सूत्र में बांधना चाहती थी व देश को स्वतत्रता दिलाना चाहती थी | बाद में बितानी सेना का विरोध करने के कारण उनको बंदी बनाकर बर्मा भेज दिया गया | उनके साथ उनके दोनों बेटो को भी कारावास में डाल दिया गया | वहा इनके दोनों बेटो को मार दिया गया व रंगून में 7 नवम्बर 1862 को इनकी मृत्यु हो गई |